Sunday, March 25, 2018

हमारा और आपका प्यार

प्यार।।।।।।।।।। देखा जाए तो इसके कितने मायने हैं. किसी के लिए ये सिर्फ चेहरे का आकर्षण है तो किसी के लिए शारीरिक संबंध बनाने का एक ज़रिया। सब के लिए अपने अपने मायने हैं। तो स्वाभाविक है कि मेरे लिए भी इसके कुछ मायने हैं। 

मेरे हिसाब से प्यार का एक ही मतलब है और वो कि खुद से पहले उनका ख़याल रखना और खुद से ज़्यादा उनका ख़याल रखना। शायद मेरे लिए प्यार के यही मायने हैं। ऐसा नहीं कि आप मेरे मायने से सहमत होंगे पर आप कुछ कर नहीं सकते क्यूँकि ये मेरा ब्लॉग है और यहाँ मैं अपने विचारों को शब्दों में ढालने के लिए स्वतंत्र हूँ। 

अक्सर मैं देखता हूँ.. पढ़ता हूँ.. सुनता हूँ..कि प्यार में इन्होने अपनी जान दे दी.. ये कर दिया वो कर दिया। मेरे ख्याल से ये प्यार नहीं हैं। क्यूंकि जब आप किसी से प्यार करते हैं तो उनकी खुशी में अपनी खुशी ढूँढते हैं। आप अगर मेरे मायने को किसी भी जगह फिट करने की कोशिश करेंगे तो पाएँगे कि मैं लगभग सही हूँ। जैसे माँ और बच्चों का प्यार. भाइयों का प्यार. यहाँ तक कि दोस्तों का प्यार (लड़की सहित)। जब हम किसी से प्यार करते हैं तो ये मत सोचिए कि वो भी हमसे प्यार करे।

और एक बात और मेरा स्वतंत्र विचार.. किसी गँवार इंसान ने कहा था कि प्यार सिर्फ एक बार होता है। घंटा मेरा। प्यार बार बार होता है अगर ऐसा नहीं होता तो आप एक बार में अपने भाई.. दोस्त.. माँ बाप बहन से प्यार नहीं कर पाते। अब यहाँ कुछ लोग कहेंगे कि ये दूसरा प्यार है वो दूसरा।तो यहाँ भी मैं वही कहूँगा..  टा मेरा।प्यार प्यार होता है और ये हमेशा हमारी जिंदगी में खुशी के लिए होता है। अगर आप किसी से प्यार करते हैं और वो आपकी ज़िंदगी में खुशी नहीं लाती है तो शायद ये सही समय है कि ऐसे लोगों से अपने आप को दूर करें। 

इसीलिए अपने प्यार के मायने को पहचाने और अच्छे से पहचान लें क्यूँकि आपकी सोच किसी भी ज़िंदगी बचा सकती है तो किसी की जिंदगी ले भी सकती है।

Saturday, October 3, 2015

क्या आप सचमुच मर्द हैं ?


मैं इस बार सिर्फ दो  कहानी लिखूँगा। मैंने  सब कुछ वही लिखा है जो मुझे उन्होंने बताया है या जो उनसे पता चला है। 

पता नहीं क्यों पर जब भी मैं महिलाओं के ऊपर कोई अत्याचार देखता हूँ तो काफी बुरा लगता है। उनके ऊपर अत्याचार करके हम अपने आप को मर्द साबित करना चाहते हैं क्या ?

पहली कहानी एक औरत के बारे में है जो अपने घर में  अपना शरीर बेचने को मज़बूर है और वो भी अपनी पति  के कारण। हर रात उनके पति अपने कुछ दोस्तों के साथ दारु पी के आते हैं और अपनी बीवी को अपने  दोस्तोँ के बीच छोड़ देता है। बस आप  ज़रा  कल्पना कीजिए क्या हालत होगी उस लड़की की जो तीन चार दरिंदों के बीच अपनी हर रात गुजारती को विवश होती  है और वो भी अपने पति के कारण । आखिर कैसे ? कोई इतना नीचे कैसे गिर सकता है ? मतलब कैसे कोई ऐसा करने का सोच सकता है ? क्या सचमुच वो एक मर्द है?

दूसरी कहानी है एक लड़की की है जो अपने दादी के साथ रहती हैं।  उनके पापा उनको देखना पसंद नहीं करते। पता है उस लड़की की गलती क्या है ? उस लड़की की गलती बस इतनी है  कि वो एक लड़की है।  और आपको जानकर ये आश्चर्य होगा कि उस लड़की के पिताजी एक डॉक्टर हैं। उस लड़की की माँ अब इस दुनिया में नहीं है और कही न कही इसके पीछे भी उनके पिताजी का ही हाथ है। क्या लड़की होना एक गुनाह है ? क्या वो 
सचमुच एक मर्द हैं ? मतलब कैसे ? क्यों? 

मेरे पास इन सारे सवालों  का कोई जवाब नहीं है।  भगवान ऐसे दिन किसी को ना दिखाए। याद रखें नारी की इज़्ज़त करें और अपने बच्चों को भी सिखायें। 


आपका 
आकाश 

Saturday, March 28, 2015

जियो ज़िन्दगी यारों भाग - २



इस कहानी के अगले भाग तक आते आते काफी समय लग गया। इसके लिए माफ़ी चाहता हूँ। 

अब आते हैं असली कहानी पर। 

उनकी पत्नी हमारे कैंपस में उनके एक दोस्त के यहां रुकी हुई थी। एक दिन मैं और मेरे सहकर्मी चाय पीने जा रहे थे।  शाम के करीब ४ बज रहे थे।  थोड़ी देर पहले  ही वो अपने दोस्त को देखकर हॉस्पिटल से आये थे।  अचानक उन्हें एक फ़ोन आया और उन्होंने तुरंत अपनी बाइक चालू की और भागे। मुझे तब तक पता नही चला जब तक वो ८ बजे मुझसे मिले। जो कुछ सुना मेरे दिमाग को सुन्न करने के लिए काफी था। 

उनके दोस्त की पत्नी ने हॉस्पिटल के पांचवी मंजिल से कूद के अपनी जान दे दी। उसी शाम उनके दोस्त ने हॉस्पिटल में अपनी आखरी सांस ली।  

कुछ समय के अंदर कितना कुछ बदल गया।  किसी ने अपना बेटा खोया तो किसी ने अपनी बेटी।  सबसे बड़ी बात कि किसी ने अपने माँ  बाप को खो दिया और उसे इस बात का पता तक नही है। 

पता नही आज वो बच्चा कहाँ होगा। किसके पास होगा। क्या उसे वो प्यार मिल रहा होगा जो उसे मिलना चाहिए था। 

उस पिता के अंदर क्या चल रहा होगा जिसने अपने बच्चे खोये।  काश कुछ ऐसा  जाता की वक़्त फिर से पलट जाता। वो अपने बच्चों को गले लगाके कह पाते कि वो उनसे कितना प्यार करते हैं। कम से कम एक ज़िन्दगी तो बच जाती। 

तो ऐसा क्या हो जाता है हमें कि हम उनके जीते जी वो नही कह पाते जो उनके खोने के बाद बोलना चाहते हैं। क्यों नही हम  उन्हें बता दे कि हम उनके कितना चाहते हैं। कितना प्यार करते हैं। 

 जो कुछ कहना चाहते हैं बोलिए। उसे खोने के बाद मत बोलिए क्यूंकि फिर उसकी कोई अहमियत नही रहती। उम्मीद है वो कुछ सीखेंगे जिन्हे ऐसी आदत है। बाकी आपकी मर्ज़ी। 

आपका 

आकाश 


Tuesday, December 9, 2014

जियो ज़िन्दगी यारों भाग - १

जो कहानी मैं लिखने जा रहा हूँ वो एक सच्ची घटना है। ये कहानी बताने के पीछे मेरा खास मकसद ये है कि मैं बताना चाहता हूँ कि आज को भरपूर ज़ीने की कोशिश कीजिए। कल के भरोसे जीना बंद कीजिये। 

ये कहानी है एक आदमी की या फिर यूँ कहूँ एक लड़के की। मैं उनके साथ अपने ऑफिस में काम कर चुका था।  ज़्यादा कुछ था नहीं हमारे बीच। बस दूर से हाय हेलो। मुझे ज़्यादा अच्छे नहीं लगते थे। उनका नाम पता नही क्यों, पर मैं बताना नहीं चाहता। कुछ दिनों के बाद उनकी पोस्टिंग दूसरी जगह आ गयी। किसी दूसरे से पता चला कि उन्होंने एक लड़की के साथ लव मैरेज कर लिया है और उनके इस फैसले से कोई भी खुश नहीं था,नाही लड़के के पिताजी ना  ही लड़की के परिवारवाले। हालांकि इससे उन्हें ज़्यादा कुछ फर्क नहीं पड़ा। दोनों अपनी ज़िन्दगी में काफी खुश थे। उनको एक बच्चे का सुख़ भी प्राप्त हुआ।  

अब कहानी की असली शुरुआत होती है। 

उनकी तबीयत अचानक ख़राब हो गयी। उन्हें बेहतर इलाज़ के लिए दिल्ली स्थित आर & आर  हॉस्पिटल भेजा गया। जाँच में पता चला कि उन्हें ब्लड कैंसर है और वो भी आखरी स्टेज पर है। मतलब बचने की  उम्मीद नहीं थी। मैं उस समय ऑफिस के कुछ काम से दिल्ली में ही था। पता चला तो बिलकुल अच्छा नहीं  लगा। पता है हम इंसानों की एक अच्छी खासियत क्या है? हमारे किसी के साथ कितने भी बुरे सम्बन्ध क्यूँ न हों ,ऐसा कुछ पता चलने पर दिल में एक टीस तो हो ही जाती है। लगता है कि ऐसा कुछ तो नहीं होना चाहिए था। 

फिर शुरू हुई एक नयी ज़ंग की। ज़िन्दगी और मौत के बीच। हालांकि इस जंग में जीत किसकी होगी ये पहले से तय था। पर इस कहानी की असली कहानी अभी बाकी थी। संयोग से उनके एक सहकर्मी मेरे साथ ही रहते थे और मुझे साड़ी जानकारी उनके द्वारा ही मिलती थी। ये सारी बातें हमें तब पता चलीं जब उन्हें हॉस्पिटल से एक फ़ोन आया कि उनके एक दोस्त की तबियत बहुत ज़्यादा ख़राब है और उन्हें हर दिन ब्लड  ज़रुरत है। फिर हमने कुछ ऐसे लोगों को खोजा जो हर दूसरे दिन अपने प्लेटलेट्स दे सकते थे। 

उनकी पत्नी हमेशा अपने पति के साथ हॉस्पिटल में ही रहती थी। उनके पिताजी,माताजी,सास,ससुर सब उनके पास थे। पर  क्या अब कुछ  सकता था ?


बाकी अगले भाग में। इस कहानी  आखरी बात बाकी है। 

आपका 

आकाश 

Friday, December 5, 2014

कितने खुशनसीब हैं हम भाग -2

पहला भाग ब्लॉग पर डालने से पहले मैंने बहुत सारे लोगों को अपना लेख पढ़ाया।शुक्र है कि उन्हें अच्छा लगा। तो अब बात करते हैं भाग 2 की।

तीसरी कहानी है एक ऐसी लड़की की जिनकी मम्मी कैंसर से पीड़ित हैं।हर महीने उन्हें हॉस्पिटल लेके जाना पड़ता है उनके इलाज़ के लिए।अगर आपसे कहा जाए कि आपके मम्मी या पापा को कैंसर है, आपको कैसा लगेगा? वो तो पिछले दो साल से ये देख रही है।आप अपने सामने दुनिया की सबसे अनमोल व्यक्ति को मौत के गर्त में जाते देखते हैं और आप कुछ नहीं कर सकते हैं।बस एक बुत्त की तरह बैठकर सब देखते रहते हैं और भगवान से एक एक दिन की मोहलत मांगते रहते हैं।क्या चलता होता उसके जेहन में ,या फिर उसके परिवार में, हम और आप बस अंदाज़ा लगाइये।

मैं ये नहीं कहता कि हमारे और आपके पास कोई प्रॉब्लम नहीं है।पर आप इस चीज़ को लेकर परेशान हैं कि आपके मोबाइल में ३जी नही है या फिर आपका बॉयफ्रेंड किसी दूसरी लड़की के साथ लंच कर रहा था।एक लड़की का उदाहरण बताता हूँ।वो बहुत परेशान लग रही थी।मैंने पूछा तो उसका जवाब था," वो अपने मोबाइल से परेशान है क्योंकि इसमें इंटरनेट तेज़ नहीं चलता। तो मैंने कहा कि ये मोबाइल का नही नेटवर्क का प्रॉब्लम है।तो उसने कहा उससे क्या, फिर भी उसे मोबाइल बदलना है और इस चीज़ को लेकर वो परेशान है। आप अगर इसे परेशानी कहेंगे तब तो भगवान् ही मालिक है, मेरे ख्याल से। 

आप चाहे माने या ना माने, मैं यकीनन मानता हूँ और मानता रहूँगा कि

"कितने खुशनसीब हैं हम"

आपका

आकाश

Saturday, November 29, 2014

कितने खुशनसीब हैं हम भाग 1

 कहानी को लिखने से पहले मुझे बहुत  देखना था। सोचना था। समझना था।

पता नहीं क्यूँ पर अब मुझे किसी बात का गम नहीं है। ऐसा नहीं है कि मेरे पास सब कुछ है। पर हाँ एक अच्छी ज़िन्दगी जीने लिए जितनी चीज़ें चाहिए,उतनी हैं। एक अच्छी फैमिली,अच्छे दोस्त वगैरह वगैरह। सैलरी भी ५ अंकों में है। मानता हूँ कि ये ज़्यादा नहीं है पर इन सब चीज़ों की कोई लिमिट भी तो नहीं हैं। पर एक अच्छी ज़िन्दगी ज़ीने के लिए जितना कुछ चाहिए सब है।  अक्सर ऐसा देखा जाता है कि लोग अपने ज़िन्दगी से खुश नहीं होते हैं। तो आइये  आप और हम मिलके ये देखने की कोशिश करते हैं कि "कितने खुशनसीब हैं हम"।

१. मैंने अपने ज़िन्दगी में काफ़ी लोगों को करीब से जानने की कोशिश की है। आइये उनकी ज़िन्दगी को करीब से देखने की कोशिश करते हैं और जानने की कोशिश करते हैं कि हम कितने खुशनसीब हैं। पहली कहानी है एक १९ साल की लड़की की। बहुत कम उम्र में शादी हो गयी थी उसकी। अपने माँ बाप की एकलौता संतान है वो। माँ और पिताजी दोनों अरब देश में नौकरी करते हैं। मतलब पैसे की कोई कमी नहीं थी उसे। एक लड़के से प्यार  गया था उसे। लड़का गरीब परिवार से था। जैसे ही उसकी परिवारवालों को भनक लगी उसकी शादी किसी इंसान से करा दी। जिसके साथ शादी हुई ,वो उसे काफी पीटता था। घर के अंदर वो हर दिन किसी न किसी के हवस का शिकार बनती थी।काफी सुन्दर है न वो। सुन्दर ऐसी कि एक बार देख लें तो नज़र हटे न हटेगी।  कभी लड़के का भाई,कभी लड़के का चाचा,बाकी की कसर उसका पति पूरा कर देता था। ऐसे माहौल में एक एक दिन काटना कैसा  सकता है आप खुद समझने की कोशिश कीजिए और सोचिये कि  "कितने खुशनसीब हैं हम"।

२. अब बात करते हैं एक ऐसे लड़के की जो  करीब १८ साल का है। एक घर में नौकर है। मैंने उसके घर बार में जानने की कोशिश की। उसके मम्मी पापा की मौत बहुत पहले हो  है। या फिर यूँ कहें कि जब वो एकदम बच्चा था तभी उसके मम्मी पापा की मौत हो गयी। फिर कुछ दिन उसके पास पड़ोस वालों ने पाला और फिर वो एक परिवार में नौकर के रूप में आ गया। पढ़ने लिखने  काफी इच्छा था। पर था तो आखिर वो नौकर ना। तो क्या फर्क पड़ता है कि वो पढ़े या नहीं पढ़े। ऐसा मैं नहीं कह रहा हूँ। ऐसा कहना था उन परिवारवालों का। 

शेष अगले भाग में 

आपका

आकाश

Monday, October 6, 2014

सुख एवं दुःख

नमस्कार बहुत दिनोँ के बाद अपना ब्लाग लिखने जा रहा हूँ। या फ़िर यूँ कहूँ कि किसी अच्छे से विषय की तलाश में था। और आज वो मौका आ ही गया।

सुख और दुःख हमारी ज़िन्दगी के उन पहलुओं में से हैं जिन्हें कोई दरकिनार नहीं कर सकता। अगर हमारी ज़िन्दगी में सुख के क्षण आते हैं तो दुःख के भी क्षण आएंगे। हाँ ये ज़रूर हो सकता है कि समय किसी चीज़ का ज्यादा हो सकता है। सुख के समय में तो कुछ पता ही नही चलता है। और वही दुःख के समय हम तुरंत ही पागल से होने लगते हैं।

यकीन मानिए इस दुनिया में हरेक किसी के पास कुछ न कुछ दिक्कत तो है। मसलन एक बच्चे के पास उसके पढाई एवं मार्क्स को लेकर दिक्कत है जिसे लेकर वो काफी परेशान रहता है। एक 11वी या 12वी क्लास के लड़के को उसकी गर्लफ्रेंड से लेकर पढाई तक का टेंशन। हमारी युवा पीढ़ी तो गर्लफ्रेंड और बॉयफ्रेंड से सदमे से तो उबर ही नही पाती है। एक माता या पिता को अपने बच्चे के भविष्य को लेकर परेशानी।वगैरह वगैरह। तो कहने का मतलब इस दुनिया में हर कोई परेशान है। बस उसके तरीके और पैमाने अलग से है। और ऐसे समय में सारे लोगों को सिर्फ एक की ही याद आती है। और वो हैं हमारे प्यारे भगवान।

वैसे मैंने नास्तिक नही हूँ पर मुझे पूजा पाठ वगैरह में ज्यादा दिलचस्पी नही है। साल में एक या दो बार मन्दिर हो आता हूँ। हाँ इतना ज़रूर मानता हूँ कि इस दुनिया में कोई ऐसी ताकतवर अदृश्य शक्ति है जो पूरी दुनिया का संचालन कर रही है। अब आप इसे जो नाम देना चाहें ,दे सकते हैं। मेरा ऐसा मानना है कि भगवान् हमेशा हमारे साथ हैं। चाहे वो हमारी ख़ुशी के क्षण हो या गम के।

कुछ दिन पहले मैं अपने एक दोस्त से बात कर रहा था। पता चला कि उसकी शादी होते होते टूट गयी।वो इस बात को लेकर काफी परेशान था। ऐसा लग रहा था मानो उसकी ज़िन्दगी ख़त्म सी हो गयी है। मैं भी खुद को लेकर काफी परेशान था। कुछ दिनों के बाद मुझे घर जाना पड़ा। ट्रेन में बैठने के बाद भी मैं इन्हीं सब ख्यालों में खोया था। मैं अन्दर से बाहर आकर अपने डब्बे के दरवाजों पर खड़ा हो गया। शाम के करीब 4 बज रहे थे। ट्रेन द्रुत गति से जा रही थी। फिर मैंने कुछ देखा।

रेल की पटरियों के दोनों तरफ पानी का अम्बार लगा हुआ था। या फिर यूँ कहूं कि हमारी ट्रेन एक बाढ़ग्रस्त इलाके से गुज़ार रही थी। लोगों के आशियाने बाढ़ के पानी में बह गए। जहाँ तक भी नज़र जा रही थी सिर्फ पानी ही पानी नज़र आ रहा था। सहसा मेरी ट्रेन धीमी हो गयी और अंततः रुक गयी। मैं ट्रेन के दरवाज़े से निचे उतरा और एक 6 या 7 साल के बच्चे को अपने पास बुलाया जो मुझे टुकुर टुकुर देख रहा था। मैंने उससे इसके बारे में पूछा तो उसका जवाब कुछ यूँ था

" हमें तो इसकी आदत सी हो गयी है। अब तीन महीने हम रेल की पटरियों के पास में रहेंगे और पानी घटने का इंतज़ार करेंगे। हमारा घर हमारी आखों के सामने डूब जाता है और हम कुछ नहीं कर पाए। 3-4 दिनों के कुछ खाया नहीं है। घर के भी सारे लोग भूखे हैं। पता नहीं क्या होगा ।ये सारी बात कहते वक़्त उसके चेहरे की मुस्कान बनी रही और मेरे हृदय को द्रवित करती रही। एक वो था जो मुझे ज्यादा कहीं परेशान होकर भी अर्धनग्न अवस्था में भी खुश था और एक मैं था जिसके पास सब कुछ होने के बाबजूद ऐसा लगता था मानो दुनिया का सारा बॊझ मैंने उठा रखा हो। मेरे हाथ मेरे पर्स भी तरफ गए और उसमे से मैंने 200 रूपये निकाल कर उस बच्चे को दिए। वो काफी खुश हुआ और पैसे हाथ में लेकर खड़ा हो गया। तभी मेरी ट्रेन ने सीटी दी और वापस मैं ट्रेन के दरवाज़े पर खड़ा हो गया। मेरी ट्रेन धीरे धीरे अपने गंतव्य की तरफ चल पड़ी। वो बच्चा अपने हाथों को हिलाकर मुझे शुक्रिया कह रहा था और मेरी आखों से आसूँ अविरल बहते जा रहे थे। तब मुझे ज़िन्दगी की दो सच्चाई को बोध हुआ।एक तो ये की हर इंसान को उसकी परेशानी दुनिया में सबसे बड़ी लगती है पर ऐसा बिलकुल नही है। दूसरा ये कि जब आपको ऐसा लगे की कोई चीज़ आपको ज्यादा परेशान कर रही है तो दूसरों की मदद कीजिए। आप को काफी सुकून महसूस होगा।

मुझे इन्हीं सब बातों पर एक गाना याद आता है कि

" दुनिया में कितना गम है, मेरा गम कितना कम है"
दूजों का गम देखा तो मैं अपना गम भूल गया"।

दूसरो की मदद करें और स्वस्थ रहें सुखीं रहें।


आपका

आकाश

Monday, June 23, 2014

बाल मज़दूरी




हमारी २१वी सदी का भारत कैसा हो ये बहुत कुछ निर्भर करता है हमारी  पीढ़ी पर। पर अगर हमारी आने वाली वाली पीढ़ी ऐसी हो तो हम आने वाले समय की कल्पना  सकते हैं :-

हाल  फिलहाल  में ही मैं अपने शादी अटेंड करने घर गया हुआ था। अगर आप बिहार  के किसी ग्रामीण या कसबे में कोई शादी में शिरकत किया  नज़ारा काफी होगा कि छोटे छोटे बच्चे जिनकी  उम्र बमुश्किल १०-११ साल की होगी, अपने सर पर मुझे नहीं पता कि उसे  क्या कहते हैं पर इस तस्वीर को देखने के बाद शायद समझ जायें :-







हमारी गाड़ी करीब १० बजे अपने गंतव्य स्थान पर पहुँची थी। उस समय लेकर रात के करीब १ बजे तक इनको  अपने सर पर उठा कर रखा  और भगवान ही जाने कि इस काम  के उसे कितने पैसे मिले होंगे। अच्छा लगा ये देखकर कि उनके चेहरे पर किसी तरह की शिकन नहीं थी या फिर ऐसा रहना  आदत सी  गयी है। 

दूसरी तस्वीर कल की है जब मैं ट्रैन से सफर  रहा था।  ये सारे वाकया काफी आम हैं और लगभग हम्मे से हर किसी को इससे दो चार होना पड़ता है :-




  
जो काम हमारे रेलवे कर्मचारियों को करना चाहिए था उनको ये  कर रहे है। जिस समय में इनके हाथों में किताब और कलम होने चाहिए , हाथ में झाड़ू लिए रेलगाड़ियों के डब्बे में सफाई करते हुए ये बच्चे अक्सर पाये जाते हैं। हालांकि इसमें अच्छे लगने जैसी कोई बात नहीं है पर शुक्र है कि इन्होने ने अभी तक कोई गलत तरीके से पैसे कमाने का रास्ता अख्तियार नही किया है। 

क्या ये सारी बातें हमारे प्रशासन को नहीं पता है ? मुझे तो नहीं लगता। तो फिर दिक्कत कहा है ? क्या हमारे प्रशासन इतना लाचार हो चुका हैं कि सब कुछ जानते हुए भी अपनी आँखें मूंदे बैठा है। 

क्या ऐसा होगा हमारा २१वी सदी का भारत जिसकी कल्पना हम एक सुपरपावर के रूप में करते हैं पर किस कीमत पर ? इस कीमत पर ?? 

अपने अंदर झांकिए और सोचियेगा। 


आपका 

आकाश 

Sunday, April 20, 2014

मेरी कहानी मेरी जुबानी

करीब साढ़े चार साल हमारे रिलेशनशिप को हो चुके थे। हम दोनों ही बहुत खुश थे। अच्छी बात ये थी कि हम दोनों ने अपने रिलेशनशिप को इतने अच्छे तरीके से सजाया था कि इसमें लड़ाई, द्वेष, गाली इत्यादि जैसी चीजों के लिए कोई जगह नहीं थी। हमने इसे इतने अच्छ तरीके से संजोया था कि इसे बयां करने के लिए मेरे पास कोई शब्द नहीं है।

फिर पता नही क्या हुआ ? किसी की ज़िन्दगी को बांधने गए थे और खुद की ही छोड़ आए।मुझे क्या, जितने लोगों को पता चला कि हम दोनों के रास्ते अलग हो चुके हैं,उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था। सब लोग ऐसा सोच रहे थे कि मैं उनसे मजाक कर रहा हूँ। शायद ये मेरी ज़िन्दगी का एक ऐसा पल था जिसे मैं अपनी ज़िन्दगी में दुबारा नहीं देखना चाहूँगा।

ऐसा नहीं था कि वो काफी खूबसूरत थी या फिर कोई अमीर बाप की इकलौती बेटी थी। पर उसके अन्दर कुछ ऐसा था कि उन चीज़ों ने मुझे उनकी तरफ आकर्षित किया था। मुझे सबसे अच्छी बात जो लगी थी वो थी ज़िन्दगी को जीने के तरीके। वो हमेशा हँसते रहती थी। ज़िन्दगी को जीने का एक अलग ही नज़रिया था उनका। मुझे क्या था। मैं तो आराम से सोने वाला इंसान था।पर उन्होंने मुझे सिखाया कि ज़िन्दगी एक कमरे के अन्दर ही नहीं सिमटी है। थोडा बाहर निकल कर देखो ज़िन्दगी काफी हसीन है। मुझे एक बात और जो उनकी तरफ आकर्षित करती थी वो थी उनकी "hnji" कहने के तरीके। सही बोलू तो मन करता था कि वो hnji बोलते रहे और मैं सुनता रहूँ। जब मैं अपनी ज़िन्दगी के सबसे ख़राब दौर से गुज़र रहा था तो उनके हौसले ने मेरा काफी साथ दिया। ज़िक्र करने की शुरुआत करूँ तो शायद पता नहीं कब तक लिखना पड़ेगा।
मुझे जानने वाले इस रिलेशनशिप से काफी खुश थे। उन्हें भी हम दोनों को साथ देखकर अच्छा लगता था।

हम दोनों काफी खुश थे। हमने शादी करने की सोच रखी थी। हाँ पर हमने ये तय किया था कि हम शादी अपने घरवालों की बिना मर्ज़ी से नहीं करेंगे। हमने काफी इंतज़ार भी किया। मैंने उनके पिताजी से भी बात की थी। पर वो नहीं माने। उन्हें मेरी नौकरी और मेरी कम आमदनी से परेशानी थी। अगर हम चाहते तो हम आराम से शादी कर सकते थे पर हमने ऐसा नहीं किया। हमें अपने पेरेंट्स का और उनकी इज्ज़त का भी पूरा ख्याल था। इसीलिए हमने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया।

फिर वो नवम्बर का मनहूस महीना आया जो हम दोनों को दो राहे पर खड़ा कर दिया। पता नही उनकी क्या मज़बूरी थी कि उन्होंने शादी करने से मना कर दिया। मुझे आज भी इसका सही कारण पता नहीं चल पाया है। क्या इसके उनके घर वालों का हाथ था या वो खुद थे? पता नहीं।

वो हमेशा कहती थी कि मेरे बिना अपनी ज़िन्दगी की कल्पना भी नहीं कर सकती है। पर ऐसा कुछ नहीं है। वो आज भी अपनी ज़िन्दगी में काफी खुश है। वो हमेशा कहती थी कि मुझे बात किये बगैर वो परेशान हो जाती है। हमें बात किये बगैर करीब 5 महीने हो चुके हैं। पर वो आज भी खुश है।
अगर मैं चाहता तो मैं भी बहुत तो नहीं पर थोड़ा बहुत कर सकता था। पर ऐसा नहीं किया। मैंने उनके निर्णय का सम्मान किया। मेरे लिए ये स्वीकार करना बहुत मुश्किल था कि अब हम दोनों साथ नहीं हैं।

सच तो ये है कि मरता कोई नहीं किसी के बगैर। मैं कहना चाहता हूँ उन लोगों से जो ऐसा कुछ होने के बाद अपनी ज़िन्दगी को ख़त्म करने की सोचते हैं। मैं कहना चाहता हूँ उन लोगों से जो ऐसा कुछ होने के बाद कोई गलत रास्ता अख्तियार करते हैं।

मैं "गीता" के उन शब्दों में काफी यकीन रखता हूँ कि 'जो हुआ अच्छा हुआ,जो हो रहा है अच्छा हो रहा है, और जो होगा वो भी अच्छा होगा'।

आज भले हम दोनों साथ नहीं हैं पर हमारी यादें हमेशा हमारे साथ हमेशा रहेंगी। पता नहीं उनके साथ रहेंगी पर मेरे साथ हमेशा रहेंगी। और हाँ, किसी भी रिश्ते को झगडे के साथ ख़त्म नहीं करें। एक दुसरे का सम्मान करें क्यूंकि उन्हीं यादों में हम जिंदा हैं।


आपका

आकाश

Monday, April 14, 2014

ज़िन्दगी की एक सच्चाई

काफी दिन से कुछ  लिखने की काफी कोशिश कर रहा था। पर पिछले कुछ दिन या यूँ कहें कुछ महीने मेरी ज़िन्दगी के काफी ख़राब महीने रहे। मेरे साथ ऐसे कुछ घटनाएँ हुईं जो मुझे अंदर से तोड़ने के लिए काफी थे। पर पता नहीं क्यूँ अब कुछ भी बुरा नहीं लगता। शायद आदत ही हो गयी है मुझे या फिर मुझे ऐसे चीज़ों को आराम से झेलनें की शक्ति आ गयी हैं। 

हरेक सिक्के के दौड़ पहलू होते हैं। उसी तरीके से हमारी ज़िन्दगी में हरेक तरह के पल होते हैं। ख़ुशी के और गम के। शायद इस दुनिया में कोई भी ऐसा नहीं है जिसके पास किसी तरह की परेशानी नहीं होती है। अगर आप अपने आस पास देखें तो पायेंगे कि उनकी परेशानी हमारी परेशानी से काफी ज़्यादा है। पर उनको सुलझाने के तरीके बहुत महत्त्व रखते हैं। 

अक्सर हम देखते हैं कि हमारी परेशानी अगर २० % होती है तो हम फालतू का सोच सोच कर उसे १०० % पहुँचाने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। भले आप मेरा यकीन करें या नहीं करें। ख़ुशी और गम हमारी ज़िन्दगी के दो पहलु हैं और हमें उन्हें जीने में यकीन रखना चाहिए, ना कि उनसे पीछे हटने में। ऐसा क्यों हैं फिर कि हम अपने दुख के पल में डरना शुरू कर देते हैं? उसे सुलझाने की बजाय हम उन्हें पुरे तरीके से उलझा देते हैं। 

पिछले कुछ दिनों में मेरे पास तीन चार तरीके के दिक्कतों को देखने और समझने का मौका मिला। पता है इन सभी में बराबर क्या था ? कि लोगों से जान बूझकर उसे बड़ा करने में कोई कसर नहीं छोड़ा। सारे लोगों ने अपनी दिक्कतों के निवारण के लिए मुझे चुना।  पता नहीं लोगों को ऐसा क्यों लगता है कि मैं उनकी दिक्कतों को आराम से सुलझा सकता हूँ या फिर इसे सुलझाने के लिए कोई सही रास्ता बता सकता हूँ। पता नहीं क्यों पर ऐसा है। मजे की बात ये है कि मेरे पिताजी के हिसाब से मैं अभी भी एक 'नाबालिक' हूँ। पर मुझे अच्छा लगता है कि लोग मेरी सलाह लेते हैं और उस पर अमल भी करते हैं। 

तो क्या में इतना बड़ा हो गया कि मैं लोगों की दिक्कतें सुन सकता हूँ और उन्हें सुलझा सकता हूँ ? तो जबाब है 

हाँ 

मैं ये कर सकता हूँ। 

मेरे  अगले ब्लॉग में मैं अपनी ज़िन्दगी के कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण पहलु पर अपने विचार लिखूँगा। उम्मीद है आपको पसंद आएगी।  एक बात और। सुख और दुःख हमारी ज़िन्दगी के बहुत ही अहम पहलूँ हैं। तो इनसे न डरें। स्वस्थ रहें। अच्छे से रहें। 

आपका

 आकाश 


Sunday, December 29, 2013

आप की राजनीति

कुछ भी कहिये, पिछले कुछ दिन भारत की राजनीति एक नयी हवा की बहार में रंग चुकी है। इस नयी हवा ने बहुत सारे जमे हुए राजनीति के कचडों को भी साफ़ करने का काम किया है। और इस बदलती फिजा का नाम है "आप (आम आदमी पार्टी)।

जब ८ दिसम्बर को दिल्ली,राजस्थान, मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में हुए मतदान का रिजल्ट आया तो सभी की निगाहें सिर्फ दिल्ली में आये रुझानों पर टिक गए। भले ही बीजेपी ने चारो जगहों पर बाज़ी मारी फिर भी चारों तरफ जैसे एक ही आवाज़ सुनने को मिल रही थी और वो आवाज़ थी 'आप'। इस चुनाव में बहुत कुछ नया देखने को मिला। जैसे कि राजस्थान में बीजेपी ने दो तिहाई से ज्यादा सीटों पर दर्ज की। मध्य प्रदेश की शिवराज चौहान की सरकार तीसरी बार सत्ता में आई। एक बात गौर करने वाली ये भी थी कि पिछले चुनाव के मुकाबले बीजेपी या फिर यूँ कहें कि शिवराज सिंह की सरकार ने इस चुनाव में ज्यादा सीटों पर विजयी हुई।छत्तीसगढ़ में तीसरी बार रमन सिंह जी की सरकार बनी। पर ये सारी बातें दिल्ली में हुए चुनाव के अन्दर दब गयी। आलम तो ये था कि उसी समय शायद 9 बजे मैं ndtv पर रविश जी का कार्यक्रम देख रहा था और बीजेपी की तरफ से शाहनवाज़ हुसैन जी आये थे और उन्हें रविश जी को ये कहना पड़ गया कि कोई भी बीजेपी को बाकी बचे ३ राज्यों में मिली हुई सफलता के बारे में बात तक नहीं करना चाहता। जिसे देखो, आम आदमी पार्टी की बात कर रहा है।

क्यूँ न करें हम उसकी पार्टी की बात शाहनवाज़ जी, जिसने अपने उद्गम के मात्र एक साल के अन्दर सारी पार्टियों की चूले हिलाकर रख दी। उन दिनों मेरी राजनीति में दिलचस्पी काफी बढ़ चुकी थी।मतदान के रिजल्ट आने से पहले एक प्रोग्राम में बीजेपी की तरफ से संदीप पात्रा (नाम शायद कुछ ऐसा ही है अगर मैं गलत न हूँ तो) ने कहा था कि आम आदमी पार्टी दिल्ली में सरकार बना सकती है लेकिन उसे 10 -15 साल तक इंतज़ार करना पड़ेगा। उनका कहता था कि ऐसा थोड़े ही न होता है कि आपने एक साल पहले कोई पार्टी बनाई और सीधे चुनाव जीतने के सपने देखने लगे और सरकार बनाने के सपने देखने लगे। दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दिक्षित जी ने इन्हें कीड़े मकोड़े की संज्ञा दे दी थी। पर लगता है कि सत्ते की मद में चूर इन्होने राजनीति के प्रथम पाठ पर ध्यान ही नहीं दिया जहाँ ये कहा गया है कि कभी भी अपने दुश्मनों को अपने से छोटा मत समझो। काश उन्होंने इस बात पर ध्यान दिया होता।

समझने वाली बात ये भी है कि आप आदमी पार्टी के अधिकतर नेताओं को इन सभी चीजों का अनुभव नामात्र के बराबर है।फिर ऐसा क्या हुआ कि इन्होने बड़े बड़े सूरमाओं के छक्के छुड़ा दिए।बात कोई भी हो, एक बात तो तय है। अब राजनीति बदल रही है। लोगों ने अपने वोट की कीमत पहचानी है। अपने अलग ब्लॉग में अरविन्द केजरीवाल जी के बारे में कुछ लिखने की कोशिश करूँगा। एक बार फिर से आम आदमी पार्टी को उनकी शानदार प्रदर्शन के लिए शानदार बधाई।

आपका 

आकाश

Saturday, December 21, 2013

रिश्तों के भंवरजाल-2

हालाकिं पिछले कुछ  दिन भारतीय राजनीति के लिए एक शुभ दिन लेकर आया फिर भी मैं उसकी चर्चा अपने अगले लेख में करूँगा। काफी दिनों से मैं कोशिश कर रहा था कि मैं अपने इस लेख को जल्द से जल्द आपके पास पहुँचाऊ।

ये लेख लिखते समय मेरे दिमाग और दिल दोनों साथ दे रहे हैं तो मैं आपको ये बता दूं की मैं अभी सिर्फ 28 साल का हूँ। तो मैं जो कुछ भी लिखूँ. हो सकता है कि उसमे कुछ कमी हो तो मैं माफी चाहता हूँ।

ये लेख मैं उन तमाम लागों,नौजवानों को समर्पित करना चाहूँगा जिनकी नैया मझधार में फँसी है।

अगर आप अपने हमसफ़र से खुश नहीं हैं ,नाराज़ हैं, तो आइये कुछ तरीके देखें (मेरे हिसाब से) जहाँ आप एक नयी ज़िन्दगी की शुरुआत कर सकते हैं।

1. किसी भी रिश्ते की मजबूती दो चीजों पर निर्भर करती है - भरोसा और सच्चाई। अगर आपको लगता है कि आपके रिश्ते में दोनों चीज़ मौजूद है तो आप बधाई के पात्र हैं। अक्सर ये देखा गया है कि हम थोड़ी देर की ख़ुशी पाने के लिए अपने हमसफ़र से झूठ बोल देते हैं पर यकीन मानिए,यही थोडा थोडा छोटा छोटा हमारी ज़िन्दगी में एक दरार पैदा करने लगती हैं। जहाँ तक बात है भरोसे कि तो अपने हमसफ़र पर इतना भरोसा ज़रूर करें कि अगर आप अपने हमसफ़र को किसी पराये के साथ देखें तो इसका अन्य अर्थ न निकालें। मैंने कई ऐसे लोगों को देखा है। इसीलिए मैंने ऐसा लिखा।

2. किसी भी अच्छे रिश्ते में अहम् या घमंड की कोई जगह नहीं है। अक्सर ये देखा गया है कि किसी बात पर अगर लड़ाई हो जाए तो दोनों लोगों के मन में एक ही बात होती है कि पहले मनाने की पहल दूसरा करें ।हर बार मैं ही क्यूँ???? मैं आपसे पूछता हूँ कि अगर आप ऐसा कर देंगे तो क्या आप छोटे हो जाएँगे?? कतई नही। तो अपने अहम् को अपने रिश्ते में से हटा दें।

3. एक अच्छे रिश्ते की बोल चाल में गलत लब्जों या फिर यूँ कहें कि गालियों की कोई जगह नहीं है। अगर आपको लड़ाई ही करनी है तो गलत लब्जों का प्रयोग न करें। अब आप कहेंगे कि लड़ाई के वक़्त कौन इन चीजों पर ध्यान देगा?? तो मैं आपसे कहना चाहूँगा कि आप समय से ही अपनी बोल चाल की शैली पर ध्यान दें। मेरा ऐसा मानना है कि अगर मैं अपने हमसफ़र से 'तुम' की जगह ' आप' करके बात करूँ तो दोनों के बीच एक अच्छे वातावरण का निर्माण होता है।

4. बात करने से बात बनती है। तो जब भी आपको लगे कि आप दोनों के रिश्ते ठीक नहीं हैं तो उन सभी चीजों पर पूरी ईमानदारी से बात करें और यकीन कीजिये आप इसमें सफ़ल भी होंगे।हाँ पर आपका प्रयास ईमानदारी से होना चाहिए।

5. जब आपको लगे कि हालात कुछ ज्यादा ही ख़राब है और पानी सर के ऊपर से बह रहा है तो आप अपने बड़ों से संपर्क कीजिये। अक्सर ये देखा गया है कि लोग अपने बड़ों के पास जाने में काफी कतराते हैं। उन्हें ऐसा लगता है कि अगर इन्हें कुछ पता चल गया तो मेरी इज्ज़त को तो फालूदा हो जाएगा। जनाब ऐसा कुछ नहीं होगा। चुकिं उन्होंने आपसे ज्यादा दुनिया देखी है तो वो आपका बेहतर मार्गदर्शन कर सकते हैं।तो निः शंकोच अपने बड़ो से बात करे।

मेरे ख्याल से ये कुछ ऐसी बातें हैं कि आप अपने रिश्ते को एक बेहतर दिशा दे सकते हैं। ऐसा नहीं है कि आप सिर्फ इन्हीं बातों से अपने रिश्ते को बेहतर कर सकते हैं। इनके अलावे भी बहुत सारी बातें हैं पर मुझे जो लगा मैंने लिखा।

बाकी सब कुछ आपके ऊपर छोड़ता हूँ और मैं आम आदमी पार्टी को बहुत बहुत बधाई देना चाहता हूँ उनके शानदार प्रदर्शन के लिए।

शुभ रात्रि

आकाश


Thursday, November 28, 2013

रिश्तों के भंवरजाल में

पिछले कुछ  दिनों से मैं रिश्तों के भँवरजाल को  जितना सुलझाने कि कोशिश कर रहा हूँ , लगता है कि उलटे उतना फँसते जा रहा हूँ। सही कहूँ तो ये एक ऐसा दलदल है कि आप जितना इससे निकलने कि कोशिश करेँगे ,उलटे उतने  ही आप धँसते जाएँगे। पिछले कुछ घटनाओं ने मुझे सोचने पे विवश कर दिया है कि मुझे शादी करनी चाहिए भी कि नहीं। अगर देखा जाए कि मुझे शादी क्यूँ करनी चाहिए तो गिन कर मेरे पास एक या दो कारण है। वो ये कि मैं लड़की से प्यार करता हूँ। बस एक ही कारण से मेरे पास। शादी नहीं करने के मैं पांच छः कारण तो बता ही सकता हूँ। जैसे कि रोज़ कि चिक चिक ज़हीक ज़हीक से आज़ादी। किसी भी चीज़ पर कोई पाबंदी नहीं। आप और आपके माता पिता के बीच में कोई रुकावट नहीं होगी। आपकी आज़ादी में खलल डालने वाला कोई नहीं होगा वगैरह वगैरह।

मैं जानता हूँ कि बहुत सारे लोगों को मेरी बात बकवास भी लगती होगी। खैर जैसी जिसकी सोच। तो मैं उनलोगों से जिन्हें मेरी बात थोड़ी सी बकवास लग रही हो,उनसे मैं ये सवाल पूछना चाहता हूँ कि  शादी के बाद पति पत्नी के बीच ऐसा क्या हो जाता है कि यह पवित्र रिश्ता थोड़े से समय में ज़िन्दगी के बीच समुन्द्र में हिचखोले खाने लगता है और किनारे तक आते आते ये पवित्र रिश्ता तार तार हो जाता है (यह सवाल में आजतक अपने आसपास हो रहे घटनाओं को देखने के बाद ही पूँछ रहा हूँ)।  फिर उन कसमों और रिवाज़ों का क्या जो शादी के वक़्त पति - पत्नी एक दूसरे से करते हैं। और नहीं निभा सकते हैं तो शादी क्यूँ करना। किसी कि ज़िन्दगी बर्बाद करने का किसी को क्या अधिकार है ?

बहुत लड़के लड़कियों को ये कहते सुना हूँ कि वो सिर्फ़ प्यार के सहारे अपनी पूरी ज़िन्दगी बीता लेंगे। पर सच तो ये है मेरे दोस्त कि जब गरीबी/दुःख घर से एक दरवाज़े से प्रवेश करती है तो पूरा प्यार एक झटके से साथ दूसरे दरवाज़े से रफूचक्कर हो जाता है।  जिन्होंने अभी तक शादी नहीं कि होंगी,अगर वो मेरा ब्लॉग पढ़ रहे होंगे,तो उन्हें ऐसा लग रहा होगा कि मैंने ये सब क्या फालतू फालतू लिखा है।  हो सकता है कि उन्हें उनके प्यार पर गर्व हो पर मेरा ऐसा मानना है कि सिर्फ़ प्यार से सहारे ज़िंदगी बिताना मुश्किल ही नहीं,नामुमकिन है(थोडा फिल्मी टच)। 

सच तो ये भी है कि सुख और दुःख ज़िन्दगी के अजीब पहलु हैं जो कभी आपका पीछा छोड़ने को तैयार नहीं होते।  प्रायः ये देखा गया है कि दुःख वाली घड़ी में नव दम्पतियों के पाँव डगमगाने लगते हैं जो ज्यादातर एक दूसरे के बीच दूरियाँ बनाने के लिए काफ़ी है। 

तो इनका इलाज़ क्या है ? क्या एक दूसरे से अलग हो जाना आपके ज़िन्दगी के सारे गम मिटा देगा ? शायद नहीं। अपने अगले लेख में मैं कुछ तरीके बताने कि कोशिश करूँगा जिससे हमलोग फिर से एक सही राह पकड़े और ज़िन्दगी पुरे जोश के साथ जियें। 

आकाश 

Saturday, October 19, 2013

एक सच्चाई

नमस्कार दोस्तों

मैं आकाश स्वागत करता हूँ आपका मेरे ब्लॉग पर। आप सभी को विजयादशमी की ढेर सारी शुभकामनायें। काफी दिनों से कुछ लिखने की कोशिश कर रहा था। पर मेरे कंप्यूटर में कुछ खराबी आ जाने के कारण मैं कुछ लिख पाने में विवश था। ऊपर से मेरे पास कोई अच्छा सा विषय नही था।

फिर आज एक अच्छा विषय मिला तो सोचा कि मेरे विचारों को आप तक पहुचाऊ।

दरसल कुछ दिन पहले मेरे रूम में एक नया लड़का आया।बातचीत से पता चला कि पिछले साल उसके पिताजी की मृत्यु हो चुकी है और उसकी माँ की तबियत भी काफी ख़राब है और उसे तुरंत घर जाना होगा। उस समय उस लड़के की आखों में उसके दर्द को देखा जा सकता था। कुछ ऐसा ही वाक्या करीब 2-3 साल पहले मेरे साथ हुआ था। उन दिनों मैं दिल्ली में था और मेरे ही ऑफिस में एक मुझसे सीनियर का आगाज़ हुआ। बातचीत का सिलसिला चला। फिर मैंन बातचीत में उनके माँ और पिताजी के बारे में पूछा। थोड़ी ही देर में उनकी आखों से आंसू की धार निकल पड़ी। मैं सन्न हो गया। थोड़ी देर के बाद मुझे किसी और से पता चला कि उनकी माताजी का काफी साल पहले देहांत हो चुका था। एक बार बातों ही बातों में उन्होंने जिक्र किया था कि वो अपनी माताजी को काफी मिस करते हैं।

तो फिर ऐसा क्यों है कि जिनके पास उनके माता पिता जिंदा है,वो इस चीज़ को नहीं समझ पा रहे हैं। आजकल ये चीज़ तो काफी आम हो गयी है कि लोग अपने माता पिता के साथ बुरा सलूक करते हैं। उन्हें मारते है,पीटते हैं। ऐसा क्यूँ?? उन्हें अपने साथ रखने को तैयार नही हैं। क्यूँ??आखिर ऐसा क्या हो गया??

मैंने अपनी ज़िन्दगी में जितना कुछ देखा,सिखा, उससे मैं ये ज़रूर कह सकता हूँ कि हमें जो चीज़ आसानी से हासिल हो जाती है,हम उसकी कद्र करना भूल जाते हैं। यकीन मानिये, मैं सच कह रहा हूँ। और अगर यकीन न हो तो अपने गिरेबान में एक बार झाकिये। आपको खुद पता चल जाएगा। मैं कोई इनमे से अलग नहीं हूँ। मेरे साथ भी ऐसा ही है।

अपने आप को बदलने की कोशिश कीजिये और उन्हें ये एहसास दिलाये की उनकी मौजूदगी आपकी ज़िन्दगी में कितनी अहमियत रखती हैं। एहसास दिलाएं की उनके बगैर आपकी ज़िन्दगी थोड़ी रूक सी जाएगी,ठहर सी जाएगी। 

तब तक अपना ख्याल रखिये, स्वस्थ रहिये और रंग्रेज्ज़ फिल्म का 'दिल को आया सकूं' गाना सुनते रहिये।

आपका 

आकाश

Friday, August 2, 2013

मोकामा में तत्काल आरक्षण

रेलवे रिजर्वेशन के काउंटर पर आम  रिजर्वेशन लेने में कितनी तकलीफ होती है ये तो सब को पता है।  तो जरा सोचिये कि अगर आपको कहा जाये कि आपको तत्काल रिजर्वेशन लेना है तो आपकी हालत क्या होगी? ठीक ऐसी ही हालत मेरी थी जब मुझे कहा गया की हमें दिल्ली के लिए रिजर्वेशन तत्काल में लेना होगा। हालत बुरी इस लिए भी थी मुझे ये शुभ कार्य करने का मौका मेरे होम टाउन में ही मिला मतलब कि मुझे मोकामा स्टेशन से तत्काल टिकट लेना था।

बस फिर क्या था। मेरी हालत ख़राब हो गयी में. एक बार तो मुझे ये लगा कि मुझे किसी किराने की दुकान से नमक का पैकेट खरीदने जितना आसान है पर तुरंत मैं होश में आया और बोला कि अगर इतना ही आसान है तो तुम्ही चले जाओ और रिजर्वेशन करवा कर ले आओ.

भाई से चुपके से कन्नी काटी और मुझे में महान कार्य करने को कहा गया. मेरी तो रात की नींद वैसे ही गायब हो चुकी थी. वैसे भी कुछ दिन पहले ही mokamaonline.com के सौजन्य से ये खबर मिली थी कि टिकेट खिड़की पर दलालों का ही कब्ज़ा था. अक्सर मैंने देखा है की जिन लोगों को तत्काल का रिजर्वेशन लेना होता है वो टिकेट खिचड़ी पर ही अपनी रात बिताना पसंद करते है और यकीं मानिये जब वो सवेरे तत्काल रिजर्वेशन का कन्फर्म टिकेट मिलता है तो आप उनके चेहरे को देखिये। ऐसा लगता है मानो तीसरा विश्व युद्ध जीत कर आ रहे हैं

मैंने सोचा कि मुझे भी ये महान कार्य करना चाहिए।फिर मैंने सोचा की सीधे सवेरे जाकर  टिकट ले लूँगा। रात भर मेरे नींद और समय के बीच तगड़ी लड़ाई चल रही थी. नींद तो आखों से कोसो दूर थी. सवेरे सीधे ६ बजे उठकर रेलवे रिजर्वेशन  काउंटर पर हाजरी लगाई। पर वहां तोह मुझे पहले ढेर सारे लोगों ने टिकेट खिड़की पर कब्ज़ा कर रहा था. मैंने तो सोच लिया की भाई अगर आज मैं यहाँ से कन्फर्म टिकेट ले लूँगा तो ये मेरे ज़िन्दगी में एक यादगार पल बन जायेगा।

वहां पहुचने पर पता चला की यहाँ एक लिस्ट हैं जिसमें अपना नाम दर्ज करवाना है . मैंने शुभ काम में देर न करते हुए अपना नाम लिखवाया। पता चला की मुझसे पहले यहाँ करीब १४ महाशय हैं जिन्हें तत्काल रिजर्वेशन लेना था . बस फिर क्या था मेरा दिल धक् से बोला कि क्या अभी भी मुझे यकीन है कि मुझे तत्काल टिकेट मिल जायेगा। बुझे मन से मैं वापिस अपने घर पर आ गया. 

ठीक ९   बजे मैं रिजर्वेशन काउंटर पर पहुँच गया. धीरे धीरे लोगों की भीड़ बढ़ने लगी. मुझे तो लगा कि आज तो टिकट मिलने से रहा.साढ़े नौ बजते ही एक भारी भरकम तोंद लिए रेलवे सुरक्षा बल के एक जवान ने अपनी एंट्री करवाई। जमीन पर दो तीन बार अपना डंडा पटका और सभी को लाइन में हो जाने को कहा।  मैंने सोचा कि क्या हम उसी तरीके से लाइन में खड़े होंगे जैसे हमारा लिस्ट में नाम लिखा गया था? हमारे पुलिस साहब में तुरंत उस लिस्ट से हिसाब से सबको लाइन में हो जाने को कहा।  मजे की बात तो ये थी कि हम सभी लोग आराम से लाइन में लग गए।  मुझे एक बार तो लगा कि क्या मैं  मोकामा स्टेशन पर हूँ कि सिपाही जी के एक बार कहते ही सभी लाइन में लग गए।

जी हाँ, ये मेरा ही मोकामा था जहाँ ऐसा हुआ।  लोग बदल रहे हैं और मुझे ख़ुशी है कि आप और हम इस बदलाव के प्रतीक हैं।

खैर, मेरा पन्द्रहवां नंबर था और मैं ८ मिनट में रिजर्वेशन काउंटर पर अपना टिकट कटा रहा था और नौवे मिनट में टिकट मेरी जेब में था। मैं तत्काल रिजर्वेशन का ये युद्ध इतनी आसानी से जीत जाऊंगा, मुझे ऐसी आशा कतई न थी पर ये हुआ और वो भी मेरे मोकामा में।


Sunday, July 21, 2013

फादर डे - मेरे पिताजी भाग -४

वायु सेना में आने के बाद थोड़ा अच्छा तो लगा पर ये वो जगह नहीं थी जहाँ मेरे पापाजी मुझे देखना चाहते थे।पुरे मन से न सही पर आधे अधूरे मन से किसी तरह से उन्होंने अपने आप को मनाया। समय बीता।मैं अपनी नौकरी अच्छे तरीके से कर रहा था। इस दौरान मैंने कई परीक्षाएं दी पर अफ़सोस मैं पास नहीं कर पाया। तीन बार एस एस बी इंटरव्यू से आखरी दिन बाहर हुआ। 

ऐसा नहीं था कि मैं कोशिश नहीं की पर कुछ खास हुआ नहीं। पता है जब इंसान गलत होता है न तो वो खुद से भी दूर भागने की कोशिश करता है। मैं भी कुछ ऐसा ही कर रहा था। जरा सोचिये कि आप के पिताजी और आपके दोस्त के पिताजी एक दुसरे को अच्छे तरीके से जानते हैं। मेरा दोस्त एक अधिकारी बनता है और मैं एक आम कर्मचारी जबकि दोनों से एक साथ एक ही स्कूल से पढाई की। फिर मेरे पिताजी को कैसा लगता होगा जब वो मेरे दोस्त के पिताजी से मिलते होंगे। आखिर उन्होंने मेरी पढाई से लेकर मेरे हरेक सुख दुःख का ख्याल रखा तो क्या मैं उनके लिए इतना नहीं कर सकता था? आखिर उन्हें चाहिए ही क्या था? यही न की उनका बेटा कुछ अच्छा करे। उनका नाम रौशन करे। अफ़सोस मैं ऐसा नहीं कर पाया।

मेरी नौकरी को सात साल बीत चुके हैं। आजतक मेरे पिताजी ने ये नहीं कहा कि मैंने अपनी ज़िन्दगी में कुछ नहीं किया या फिर मैंने उनका नाम डूबा दिया और कभी कहेंगे भी नहीं। क्या करें आखिर बाप ठहरे ना। बेटा चाहे कैसा भी को, उसकी हरेक तकलीफ उनके माता पिता के लिए बहुत दर्द लाती है। अक्सर उनकी आखें कहने की कोशिश करती है कि क्या उनका ये हक नहीं था कि मैं भी कुछ अच्छा करूँ और कम से कम एक अधिकारी बनूँ।पर मेरी दिक्कत ये है की मैं उनसे आखें नहीं मिला पाता और मुझे इस बात का अफ़सोस हमेशा रहेगा। 

ऐसा नहीं है की मैंने कोशिश जारी नहीं रखी हैं पर देखिये कब सफलता मेरे कदम चूमती है। हर रात को सोते वक़्त अपने आप से एक वादा करके सोता हूँ कि एक दिन मेरे पिताजी गर्व से कहेंगे अन्नी मेरा बेटा है।उम्मीद करिए की मैं अपने पिताजी का नाम अभी से ज्यादा रौशन कर सकूँ।

आलम ये है कि कभी कभी सोते वक़्त जब ये सब सोचता हूँ तो मेरे आखें नम हो जाती हैं।आखें लोर से डब डब भर आती हैं।मैं आज भी जब क़यामत से क़यामत का 'पापा कहते हैं' गाना  सुनता हूँ तो याद आता है वो समय जब हम अपने पिताजी को कहा करते थे कि हम भी आपका नाम रौशन करेंगे। अगर मेरा हाल ये है तो मेरे पिताजी का क्या हाल होता होगा? उन्होंने अपनी ज़िन्दगी में काफी संघर्ष किया है।काश उनका यह नालायक बेटा भी ऐसा कर पाता। सवाल काफी है और जवाब सिर्फ मैं।

एक चीज़ मैं ज़रूर कहना चाहूँगा। कोई भी बात हो और कैसी भी हो, अपने माता -पिता से ज़रूर शेयर करें। विश्वास करें वो हमेशा आपके साथ होंगे। आखिर बात करने से ही तो बात बनती है।

अगले ब्लॉग में एक सच्ची घटना का बताना चाहूँगा।

तब तक अपना ध्यान रखे, स्वस्थ रहे और हाँफिल्म 'लूटेरा' का 'अनकही' वाला गाना सुनते रहें।

आपका 

आकाश 

Sunday, July 14, 2013

फादर डे - मेरे पिताजी भाग - 3

एक अच्छे स्कूल से पढाई करने के बाद हरेक पिता को ये इच्छा होती है कि उसका बेटा जीवन में कुछ अच्छा करे। उच्च पदों पर जाये।खूब नाम कमाए।अफ़सोस मैं ऐसा करने में नाकाम रहा।मैं बस ५८.४ प्रतिशत से अपनी बारहवी की परीक्षा पास ही की थी।

घर में काफी टेंशन का माहौल चल रहा था।एक तो पढने में इतना सारा खर्चा और हमारे घर के हालात उतने अच्छे नहीं थे।हलाकि पापाजी ने इतना ही कहा कि उन्हें पहले से ही मुझसे ज्यादा यकीं नहीं था। इसीलिए उन्हें ज्यादा दुःख नहीं हुआ था। खैर ये तो कहने की बात है वरना दुःख किसे नहीं हुआ था। फिर मुझे बनारस भेज गया अपनी बारहवी की पढाई दुबारा करने। मैं इतना बिगड़ा हुआ था कि यहाँ भी मैं पढाई के बदले क्रिकेट खेलने में व्यस्त हो गया। यहाँ भी मेरा कुछ नही हो पाया।

हाँ, इतना ज़रूर था की इतने दिनों में मैंने कुछ फॉर्म्स भर दिए थे और कुछ का बुलावा भी आ गया था। ऐसा नहीं था कि मुझे बुरा नहीं लग रहा था। पर मैं अपनी तरफ से कोई कॊशिश नहीं की थी या फिर ये कहूँ कि ईमानदार कोशिश नहीं की थी।

इसी बीच में मुझे वायु सेना के गैर तकनीकी ब्रांच के लिए बुलावा आ गया (भगवान की दया से) और मैंने आव न ताव देखा और यहाँ आ गया।मेरे ऊपर भी काफी प्रेशर था और मैं इससे कहीं दूर जाना चाहता था।

अफ़सोस कि मैं आज इसे ख़त्म नहीं कर पाया तो अगले भाग में मैं इसे खत्म करने की कोशिश करूँगा।

तब तक अपना ध्यान रखें, स्वस्थ रहें और हाँ, भाग मिल्खा भाग का 'जिंदा' वाला गाना सुनते रहे।

शुभ रात्रि 

आपका 

आकाश  

Monday, July 8, 2013

फादर डे - मेरे पिताजी भाग - २

शायद ही ऐसा हो कि माँ - बाप अपने बच्चों को पीटें और उनका सीना छलनी न हुआ हो। हमारे पीठ के दाग भी कुछ इसी तरफ इशारा कर रहे थे। पापाजी काफी परेशांन लग रहे थे।उन्हें काफी ज्यादा तकलीफ हुई थी।पर क्या करें, बच्चों को सही राह दिखाना भी उन्ही का फ़र्ज़ है और वो उसे ही निभा रहे थे।

११ साल का होते होते हमने पापाजी से करीब ३ बार अच्छी पिटाई खा चुके थे। मेरे बड़े भैया का स्कोर कुछ ज्यादा था। वैसे भी वो कुछ ज्यादा ही शरारती था।

साल १९९७, महीना जून जब मेरा दाखिला देश के सर्वोतम स्कूलों में से हुआ,"सैनिक स्कूल बIलाचडी" . इसी बीच मेरे पिताजी के ऊपर कुछ केस दर्ज हो गया जिससे उनकी नौकरी चली गयी।साल १९९८ में हमारी दादी का निधन हुआ।आप ज़रा अंदाज़ा लगाये कि जब किसी व्यक्ति को २ साल तक वेतन न मिले और उसे इतने सारे दिक्कतों का सामना करना पड़े, उस इंसान के ऊपर क्या बीत रही होगी। मेरे लिए तोह अंदाज़ा लगाना ही मुश्किल है और शायद आपके लिए भी। हालाकिं मैंने अपने बचपन के काफी कम दिन घर पर गुजरे पर कभी भी उन्होंने मुझे इस बात का आभास होने न दिया।

जून १९९९ के आसपास कोर्ट का मामला ख़त्म हुआ और पापाजी को उनकी नौकरी मिल गयी।पर अभी भी हमारे घर के हालात ठीक नहीं थे। इसी बीच में पता चला कि मेरे पिताजी को ह्रदय की बीमारी हो गयी है।२००४ में मैंने बारहवी की परीक्षा पास की।दरसल पास ही की।

आगे की बात अगले और आखरी भाग में,

तब तक अपना ख्याल रखें,स्वस्थ रहें,

आपका 

आकाश        

Sunday, June 16, 2013

फादर डे - मेरे पिताजी भाग - १

पिछले कई दिनों से मैं अपने ऑफिस के काम में व्यस्त होने के कारण ब्लॉग नही लिख पाया।इसके लिए मैं आप सभी से और ब्लॉगर भैया से माफ़ी मांगता हूँ।

वैसे आज का दिन कई मायनों में ख़ास रहा।जैसे :-

आज का दिन हमने अपने पिताजी को समर्पित किया है।

बीजेपी की ख़ास पार्टी जद(यू ) ने बीजेपी से अपना नाता तोड़ लिया।

दिल्ली में आज खूब बारिश हुई। वगैरह वगैरह 

पर आज मैं सिर्फ पहले ही पंक्ति पर ही अपने विचार व्यक्त करूँगा।बल्कि मैं अपने और अपने पिता के सम्बन्ध पर थोड़ी बहुत बातें करूँगा।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि हरेक इन्सान अथवा बेटा/बेटी के जीवन में उनके पिता का काफी महत्त्व होता है और सभी के पिता दुनिया में सबसे अच्छे पिता हैं।मैं भी इनमें से कोई अलग नहीं हूँ और हाँ, मेरे पिताजी भी इस दुनिया के सबसे अच्छे पिताजी हैं।

मुझे आज भी वो समय याद है जब मैं करीब ६-७ साल का था और मैं अपने पिताजी से काफी डरा करता था। मैं क्या,मेरा शैतान बड़ा भाई भी पिताजी से खूब डरा करता था। जैसे ही पिताजी की आने की आहट सुनाई देती, हम तेजी से अपने कमरे में दुबक जाते।अगर हमें कोई चीज चाहिए होती तो हम लोग अपना पैगाम अपनी माताजी को सुनते और फिर हमारा पैगाम/फरमाइश पिताजी तक पहुचते।करीब ११ साल के होने तक मैंने पिताजी से ३ बार पिटाई खा चूका था।हालाकिं ये सारी पिटाई मैंने अपने बड़े भाई के शैतानियों के कारण खाई।

जब मुझे और मेरे बड़े भाई की पहली बार पिटाई हुई थी तो माताजी बाज़ार गई हुई थी और हमलोग छत पर पतंग उड़ाने में व्यस्त थे।  नीचे पापाजी सो रहे थे।मैं अपने पिताजी को पापाजी ही बुलाता हूँ।मेरे पापाजी को कुछ चीजों से सख्त नफरत है। जैसे कि नींद पर किसी भी तरीक़े का शोर उन्हें पसंद नहीं है। फिर क्या था, प्रेम से हमें छत से नीचे बुलाया गया और जम कर धुलाई हुई। मुझे खुद भी याद नहीं है कि हमें किस किस चीज़ों से पीटा गया था।याद बस इतना है कि पिटाई के  बाद पापाजी बाहर चले गए और मम्मी ने हमारे कपड़े उतारे तो पीठ पर देर सारे काले निशान थे। फिर हमारी गरम पानी से सेकाई की गयी। रात को पापाजी के आने से पहले हमलोग खाना खा कर सो चुके थे।सवेरे जब आखें खुली तो हमने देखा कि हमारे तकिये के पास ढेर सारे चॉकलेट्स पड़े थे। पूछने पर मम्मी ने हमें बताया कि रात में ये सारे चॉकलेट्स पापाजी लेकर आये थे पर तब तक हम लोग सो चुके थे।

तो ये थी मेरे पिताजी की कहानी मेरी जुबानी भाग - १ 

आगे जल्दी लिखने की कोशिश करूँगा।

तब तक अपना ध्यान रखिये,सुरक्षित रहिये।

शुभ रात्रि 

आकाश 

Saturday, May 11, 2013

Long Live My Parents

Its one of the most important day of my Life i.e 11 May. My parents have completed 33 years of their journey of life together. Best wishes from their Children.

Akash