Saturday, October 3, 2015

क्या आप सचमुच मर्द हैं ?


मैं इस बार सिर्फ दो  कहानी लिखूँगा। मैंने  सब कुछ वही लिखा है जो मुझे उन्होंने बताया है या जो उनसे पता चला है। 

पता नहीं क्यों पर जब भी मैं महिलाओं के ऊपर कोई अत्याचार देखता हूँ तो काफी बुरा लगता है। उनके ऊपर अत्याचार करके हम अपने आप को मर्द साबित करना चाहते हैं क्या ?

पहली कहानी एक औरत के बारे में है जो अपने घर में  अपना शरीर बेचने को मज़बूर है और वो भी अपनी पति  के कारण। हर रात उनके पति अपने कुछ दोस्तों के साथ दारु पी के आते हैं और अपनी बीवी को अपने  दोस्तोँ के बीच छोड़ देता है। बस आप  ज़रा  कल्पना कीजिए क्या हालत होगी उस लड़की की जो तीन चार दरिंदों के बीच अपनी हर रात गुजारती को विवश होती  है और वो भी अपने पति के कारण । आखिर कैसे ? कोई इतना नीचे कैसे गिर सकता है ? मतलब कैसे कोई ऐसा करने का सोच सकता है ? क्या सचमुच वो एक मर्द है?

दूसरी कहानी है एक लड़की की है जो अपने दादी के साथ रहती हैं।  उनके पापा उनको देखना पसंद नहीं करते। पता है उस लड़की की गलती क्या है ? उस लड़की की गलती बस इतनी है  कि वो एक लड़की है।  और आपको जानकर ये आश्चर्य होगा कि उस लड़की के पिताजी एक डॉक्टर हैं। उस लड़की की माँ अब इस दुनिया में नहीं है और कही न कही इसके पीछे भी उनके पिताजी का ही हाथ है। क्या लड़की होना एक गुनाह है ? क्या वो 
सचमुच एक मर्द हैं ? मतलब कैसे ? क्यों? 

मेरे पास इन सारे सवालों  का कोई जवाब नहीं है।  भगवान ऐसे दिन किसी को ना दिखाए। याद रखें नारी की इज़्ज़त करें और अपने बच्चों को भी सिखायें। 


आपका 
आकाश 

Saturday, March 28, 2015

जियो ज़िन्दगी यारों भाग - २



इस कहानी के अगले भाग तक आते आते काफी समय लग गया। इसके लिए माफ़ी चाहता हूँ। 

अब आते हैं असली कहानी पर। 

उनकी पत्नी हमारे कैंपस में उनके एक दोस्त के यहां रुकी हुई थी। एक दिन मैं और मेरे सहकर्मी चाय पीने जा रहे थे।  शाम के करीब ४ बज रहे थे।  थोड़ी देर पहले  ही वो अपने दोस्त को देखकर हॉस्पिटल से आये थे।  अचानक उन्हें एक फ़ोन आया और उन्होंने तुरंत अपनी बाइक चालू की और भागे। मुझे तब तक पता नही चला जब तक वो ८ बजे मुझसे मिले। जो कुछ सुना मेरे दिमाग को सुन्न करने के लिए काफी था। 

उनके दोस्त की पत्नी ने हॉस्पिटल के पांचवी मंजिल से कूद के अपनी जान दे दी। उसी शाम उनके दोस्त ने हॉस्पिटल में अपनी आखरी सांस ली।  

कुछ समय के अंदर कितना कुछ बदल गया।  किसी ने अपना बेटा खोया तो किसी ने अपनी बेटी।  सबसे बड़ी बात कि किसी ने अपने माँ  बाप को खो दिया और उसे इस बात का पता तक नही है। 

पता नही आज वो बच्चा कहाँ होगा। किसके पास होगा। क्या उसे वो प्यार मिल रहा होगा जो उसे मिलना चाहिए था। 

उस पिता के अंदर क्या चल रहा होगा जिसने अपने बच्चे खोये।  काश कुछ ऐसा  जाता की वक़्त फिर से पलट जाता। वो अपने बच्चों को गले लगाके कह पाते कि वो उनसे कितना प्यार करते हैं। कम से कम एक ज़िन्दगी तो बच जाती। 

तो ऐसा क्या हो जाता है हमें कि हम उनके जीते जी वो नही कह पाते जो उनके खोने के बाद बोलना चाहते हैं। क्यों नही हम  उन्हें बता दे कि हम उनके कितना चाहते हैं। कितना प्यार करते हैं। 

 जो कुछ कहना चाहते हैं बोलिए। उसे खोने के बाद मत बोलिए क्यूंकि फिर उसकी कोई अहमियत नही रहती। उम्मीद है वो कुछ सीखेंगे जिन्हे ऐसी आदत है। बाकी आपकी मर्ज़ी। 

आपका 

आकाश 


Tuesday, December 9, 2014

जियो ज़िन्दगी यारों भाग - १

जो कहानी मैं लिखने जा रहा हूँ वो एक सच्ची घटना है। ये कहानी बताने के पीछे मेरा खास मकसद ये है कि मैं बताना चाहता हूँ कि आज को भरपूर ज़ीने की कोशिश कीजिए। कल के भरोसे जीना बंद कीजिये। 

ये कहानी है एक आदमी की या फिर यूँ कहूँ एक लड़के की। मैं उनके साथ अपने ऑफिस में काम कर चुका था।  ज़्यादा कुछ था नहीं हमारे बीच। बस दूर से हाय हेलो। मुझे ज़्यादा अच्छे नहीं लगते थे। उनका नाम पता नही क्यों, पर मैं बताना नहीं चाहता। कुछ दिनों के बाद उनकी पोस्टिंग दूसरी जगह आ गयी। किसी दूसरे से पता चला कि उन्होंने एक लड़की के साथ लव मैरेज कर लिया है और उनके इस फैसले से कोई भी खुश नहीं था,नाही लड़के के पिताजी ना  ही लड़की के परिवारवाले। हालांकि इससे उन्हें ज़्यादा कुछ फर्क नहीं पड़ा। दोनों अपनी ज़िन्दगी में काफी खुश थे। उनको एक बच्चे का सुख़ भी प्राप्त हुआ।  

अब कहानी की असली शुरुआत होती है। 

उनकी तबीयत अचानक ख़राब हो गयी। उन्हें बेहतर इलाज़ के लिए दिल्ली स्थित आर & आर  हॉस्पिटल भेजा गया। जाँच में पता चला कि उन्हें ब्लड कैंसर है और वो भी आखरी स्टेज पर है। मतलब बचने की  उम्मीद नहीं थी। मैं उस समय ऑफिस के कुछ काम से दिल्ली में ही था। पता चला तो बिलकुल अच्छा नहीं  लगा। पता है हम इंसानों की एक अच्छी खासियत क्या है? हमारे किसी के साथ कितने भी बुरे सम्बन्ध क्यूँ न हों ,ऐसा कुछ पता चलने पर दिल में एक टीस तो हो ही जाती है। लगता है कि ऐसा कुछ तो नहीं होना चाहिए था। 

फिर शुरू हुई एक नयी ज़ंग की। ज़िन्दगी और मौत के बीच। हालांकि इस जंग में जीत किसकी होगी ये पहले से तय था। पर इस कहानी की असली कहानी अभी बाकी थी। संयोग से उनके एक सहकर्मी मेरे साथ ही रहते थे और मुझे साड़ी जानकारी उनके द्वारा ही मिलती थी। ये सारी बातें हमें तब पता चलीं जब उन्हें हॉस्पिटल से एक फ़ोन आया कि उनके एक दोस्त की तबियत बहुत ज़्यादा ख़राब है और उन्हें हर दिन ब्लड  ज़रुरत है। फिर हमने कुछ ऐसे लोगों को खोजा जो हर दूसरे दिन अपने प्लेटलेट्स दे सकते थे। 

उनकी पत्नी हमेशा अपने पति के साथ हॉस्पिटल में ही रहती थी। उनके पिताजी,माताजी,सास,ससुर सब उनके पास थे। पर  क्या अब कुछ  सकता था ?


बाकी अगले भाग में। इस कहानी  आखरी बात बाकी है। 

आपका 

आकाश